चने की खेती कैसे करे ? जानिए आवश्यक जलवायु ,मिट्टी ,तापमान ,पैदावार और रोग व् रोकथाम के उपाय

Written by Saloni Yadav

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Advanced Cultivation of Gram :

आपको बता दे की चने की खेती दलहनी फसल के रूप में की जाती है ,तथा भारत में भी मुख्य रूप से की जाती है। चने का सेवन मानव शरीर के लिए काफी लाभदायक होता है। पौधे पर लगे चने को तोड़कर भी खाया जाता है ,और भूनकर भी खाया जाता है ,इसके साथ से चने से कई प्रकार की चीजों को बनाया जाता है ,इसमें 60 % कार्बोहाइट्रेट की मात्रा मुख्य रूप से मिलती है चने को एक बार उगने की बाद उसका कई बार प्रयोग किया जाता है , जैसे कच्ची पत्त्तियो की कटनी सब्जी बनाई जाती है ,उसके बाद चने आने पर उनको तोड़कर कच्चे चने को खाया जाता है ,इसका प्रयोग खाने के साथ -साथ पशुओ को भी डाल सकते है ,चने को आम भाषा में छोला भी कहा जाता है। चने की खेती भारत में मुख्य रूप से की जाती है ,विश्व में भारत में 75 % चने की खेती की जाती है ,इसके अलावा भी अन्य देशो में चने की खेती की जाती है ,जैसे बर्मा ,पाकिस्तान, टर्की और इथियोपिया मे की जाती है इसके साथ ही चने की खेती भारत के अनेक राज्यों में भी की जाती है जैसे – राजस्थान ,पंजाब ,हरियाणा ,उत्तरप्रदेश ,महाराष्ट ,मध्य्प्रदेश और कर्नाटक आदि राज्यों में की जाती है।

आपको बता दे की चने की खेती सबसे पहले मध्य – पूर्वी एशियाई देशो में की जाती थी ,लेकिन अब तो कई देशो में चने की खेती बड़े स्तर पर की जाती है। चने की खेत को रबी की फसल के साथ में उगाया जाता है। चने को शाम को भिगोकर सुबह उठकर खाने से शरीर में काफी लाभ होते है ,इसको कहने से शरीर में स्फूर्ति आती है।

भारत में चने की खेती नगदी फसल की रूप में भी की जाती है। चने की खेती सिंचित और असिंचित दोनों क्षेत्रों में की जा सकती है , चने की खेती किसानो को अधिक पैदावार देती है ,जिससे किसानो को अधिक मुनाफा होता है। अगर आप भी इसकी खेती करना चाहते है ,तो हमारी यह पोस्ट आपके लिए काफी लाभदायक होने वाली है ,हम आपको इसकी खेती की सम्पूर्ण जानकारी देंगे।

चने की खेत की आवश्यक जलवायु

आपको बता दे की चने की पौध रोपाई बारिश के मौसम की जाती है इसके पौधे ठंड में अधिक विकसित होते है। इसकी खेती को सर्दियों में गिरने वाले पाले से बचाये रखना चाहिए। अधिक वर्षा भी इसकी फसल को नुकसान पहुंचा सकती है ,इसलिए इसकी खेती ठंडी और शुष्क जलवायु में करनी चाहिए।

चने की खेती के लिए आवश्यक तापमान

आपको बता दे की इसकी खेती के लिए सामान्य तापमान की आवश्यकता होती है ,इसके बीजो को अंकुरण होने में 20 डिग्री तापमान की आवश्यकता होती है ,और इसके पौधे को अधिकतम 35 से और न्यूनतम 10 से 12 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकता है। इसकी खेती सामान्य तापमान में अच्छी पैदावार देती है।

चने की खेती के लिए आवश्यक मिट्टी

आपको बता दे की इसकी खेती के लिए उच्च जलनिकस वाली उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है इसके अलावा दोमट मिट्टी अच्छी मानी जाती है ,और अच्छी पैदावार के लिए भूमि का PH मान 6 से 7 होना अच्छा होता है। इसलिए फसल की पौध रोपाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच करनी चाहिए ।

चने की खेती के लिए आवश्यक सिचाई

आपको बता दे की चने की अधिक सिचाई असिंचित क्षेत्रों में की जाती है , जबकि सिंचित क्षेत्रों में 3 से 4 यानी कम सिचि की जरूरत होती है। चने की पहली सिचाई पौध रोपाई के 25 से 30 दिनों के बाद करनी चाहिए ,और उसके बाद आवश्यकता पड़ने पर भी सिचाई कर सकते है।

चने की खेती में खरपतवार नियंत्रण

आपको बात दे की चने की खेती में खरपतवार को नियंत्रित करना चाहिए ,क्योकि चने के पौधे काफी छोटे होते है ,जो मिट्टी से पोषक ग्रहण करते है ,ऐसे में खेत में खरपतवार होते है ,तो चने के पौधे को पोषक तत्व नहीं मिल पता है। और पौधे अच्छे से विकास भी नहीं कर पाते है ,और पैदावार में भी कमी आती है।। इसके लिए खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए खेत में प्राकृतिक तरिके का प्रयोग करना चाहिए ,उसके लिए खेत में निराई -गुड़ाई करनी चाहिए। इसके आलावा आप रासायनिक तरिके का प्रयोग भी कर सकते है ,लेकिन प्राकृतिक तरिके से पैदावार अच्छी होती है।

चने की खेती के लिए खेत को तैयार करना

आपको बात दे की किसी भी खेती के लिए खेत को तैयार करना आवश्यक होता है। खेत को तैयार करने के लिए सबसे पहले खेत की अच्छे से सिचाई करनी चाहिए उसके बाद पुरानी फसल को अच्छे से नष्ट करना चाहिए ,उसके बाद खेत को कुछ देर के लिए खुला छोड़ देना चाहिए ,ताकि खेत की मिट्टी को अच्छे से धूप लग सके। उसके बाद खेत में गोबर की खाद डालकर उसको हल की सहायता से मिट्टी में अच्छे से मिलाना चाहिए। उसके बाद खेत में पानी से पलेव करे और तब खेत की मिट्टी कुछ सूख जाये तब फिर से गहरी जुताई करे ,जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाये।

चने की खेती के लिए बीजो की रोपाई और सही समय

आपको बात दे की चने की रोपाई बीजो के रूप में की जाती है ,बीजो की रोपाई से पहले बीजो को कार्बेन्डाजिम की उचित मात्रा में उपचारित करना चाहिए ,जिससे बीजो में रोग लगने का खतरा कम हो जाता है। एक एकड़ के खेत में 100 kg बीजो की आवश्यकता होती है। बीजो की रोपाई के लिए खेत में पक्तियो को तैयार करे ,और बीजो इस बीजो की दुरी 25 cm रखते हुए ,बीजो को भूमि में 5 से 7 cm की गहराई में रोपाई करे।

इसकी फसल रबी की फसल में के साथ की जाती है। सिंचित क्षेत्रों में बीजो की रोपाई अक्टूबर और दिसम्बर के महीने में की जाती है। और असिंचित क्षेत्रों में सितम्बर और अक्टूबर के महीने में की जाती है।

चने की उन्नतशील किस्मे –

आपको बात दे की चने की खेती भारत में में मुख्य रूप से की जाती है ,चनो का आकर काफी छोटा होता है ,चने की देशी किस्मो को भारत में उगाया जाता है ,चने के बीजो की रोपाई से पहले किस्मो का चयन करना आवश्यक है ,क्योकि कुछ किस्मे कम समय भी अधिक पैदावार देती है ,चने की देशी किस्मे कुछ इस प्रकार है –

मेक्सीकन बोल्ड किस्म

चने की यह किस्म बढ़िया किस्म मानी जाती है ,जो कम समय में अधिक पैदावार देती है ,यह किस्म बीज रोपाई के 100 दिनों के बाद पैदावार देना शुरू करती है ,इस किस्म के बीजो का रंग हल्का पीलापन लिए सफेद होता है ,और यह किस्म प्रति हेक्टैयर के हिसाब से 20 से 25 किवंटल की पैदावार देती है।

काबुली क़िस्म

चने की यह किस्म सिंचित जगहों पर अधिक उगाई जाती है , जिसकी खेती व्यापारिक चीजों को को बनाने के लिए की जाती है जैसे – बेसन ,दाल आदिक तेजो को बनाया जाता है। यह किस्म काफी प्रसिद्ध है।

इंदिरा किस्म

आपको बता दे की इसके पौधे प्रति हेक्टैयर के हिसाब से 20 से 25 किवंटल की पैदावार देती है जो बीज रोपी के 100 से 125 दिनों में पककर तैयार होती है। इस किस्म के पौधे की उचाई सामान्य होती है ,इस किस्म की खेती को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है।

इसके आलावा भी इसकी अन्य किस्म पाई जाती है – JG 11 किस्म ,हिम ,वैभव , JGK – 2 किस्म ,ग्वालियर -2 ,पूसा – 256 ,पूसा – 3022 ,वल्लभ काबुली चना – 1 ,राज विजय चना – 202 ,शुभ्रा ,उज्ज्वल और राज विजय चना – 203 किस्म आदि है

चने की खेती में लगने वाले रोग और कीट व् रोकथाम के उपाय

फली बेधक कीट

यह रोग फली में छेद करके अंदर चने को खा जाता है ,यह कीट हरे रंग का होता है ,को पैदावार को कम करता है ,यह रोग पौधे पर फली के बनने के समय पोधो पर लगता है।

रोकथाम के उपाय
इस रोग के रोकथाम के लिए पौधे पर स्पाइनोसेड या इन्डोक्साकार्ब का घोल बनाकर उचित मात्रा में उसका छिड़काव करना चाहिए।

झुलसा रोग

तह रोग ज्यादार फसलों में देखने को मिल जाता है ,और सीधे पौधे की पत्तियों पर आक्रमण करता है। जो पौधे की पत्तियों पर सफेद रंग का पदार्थ छोड़ता है ,जिससे पौधे की पत्तिया कुछ दिनों में पीली पड़ जाती है ,और फसल को काफी नुकसान पहुँचता है।

रोकथाम के उपाय
इस रोग को रोकने के लिए पौधे पर गंधक या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की मात्रा का छिड़काव करना चाहिए।

इसके अलावा भी चने में अनेक प्रकार के रोग देखने को मिलते है जैसे – रस्ट रोग , उखटा रोग ,दीमक ,कुंगी रोग, सूखा रोग और सलेटी फफूंदी आदि रोग व् कीट देखने मिलते है।

चने की खेती की कटाई और पैदावार

आपको बता दे की चने की बेस्ट किस्मे बीज रोपाई के 100 से 150 दिनों के बाद पैदावार देना शुरू होती है। जब इनकी पत्तिया पीले रंग की हो जाये और चने के दानो का आकर भी सही हो जाये तब ,इनकी तुड़ाई करनी चाहिए। इसकी कटाई भूमि के पास से दराती की सहायता से की जाती है। उसके बाद चने के पौधे को धूप में सूखने के लिए छोड़ दे और उसके बाद जब पौधे सूख जाये तब उसको थ्रेसर की सहायता से दानो को निकल लेना चाहिए।

चने की खेती से किसानो को काफी लाभ मिलता है। और चने का बाजारी भाव 3 से 7 हजार रूपये प्रति किवंटल के आस -पास होता है। इसकी अच्छी किस्मो से किसानो को अच्छी कमाई होती है।

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