कुसुम की खेती कैसे करे ? जानिए आवश्यक जलवायु ,मिट्टी ,तापमान और पैदावार 

Written by Saloni Yadav

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Safflower (Kusum ) Cultivation :

आपको बता दे की इसकी खेती तेल के लिए की जाती है। कुसुम की खेती कर किसानो को अधिक मात्रा में फायदा मिलता है ,यह खेती किसानो की स्थिति को सुधारने में काफी महत्वपूर्ण है ,इसकी खेती तिलहन के रूप में भी की जाती है ,भारत में भी कुसुम की खेत मुख्य रूप से की जाती है। कुसुम का पौधा एक आयुर्वेदिक औषधीय पौधा होता है। कुसुम के पौधे का प्रत्येक भाग कुछ न कुछ काम आता ही है ,जैसे इसके छिलका ,बीज ,और पत्तियों का प्रयोग दवाइया बनाने में किया जाता है। इसके बाजो में तेल की मात्रा 25 से 35 % पाई जाती है। कुसुम में मुख्य रूप से लिनोलिक अमल पाया जाता है ,इसको मानव द्वारा भी खाया जाता है। इसका तेल ह्दय रोग से होने वाले व्यक्तियों को काफी आराम देता है। तह शरीर में रक्त वाहिकाओं में कॉलेस्ट्रॉल की मात्रा में बनाये रखता है ,कुसुम के तेल से शरीर में अनेक फायदे होते है। इस फसल को तिलहनी फसल के रूप में भी जाना जाता है।

कुसुम की फसल पुरानी मानी जाती है। भारत देश को कुसुम की फसल को उत्पादक रोग कहा जाता है। आपको बात दे की 2016 में कुसुम का भाव काफी अधिक पाया जाता है ,और कहा गया है की इसका भाव सरसो से भी कुछ महगा होता था। किसानो के द्वारा इसकी कमाई भी अच्छी की जाती है। सरकार द्वारा भी कुसुम की खेती करने के लिए बढ़ावा दिया गया है। कुसुम का प्रयोग पशुओ को चराने ने किया जाता है।

कुसुम का वानस्पतिक नाम ”करतमुस टिंक्टोरियस” है ,जो कम्पोजिटी कुल से है और इसका गुणसूत्र 2n होता है। भारत में कुसुम की खेती मुख्य रूप से की जाती है। अगर आप भी इसकी खेती करना चाहते है तो आज हम आपको इसकी खेती की सम्पूर्ण जानकारी इस पोस्ट के माध्यम से की जाती है।

कुसुम की खेत के लिए आवश्यक जलवायु और तापमान

आपको बता दे इस फसल की अच्छी पैदावार के लिए जलवायु का होना आवश्यक होता है आपको बात दे की बीजो को अंकुरण के समय 15 से 17 डिग्री तापमान होना चाहिए तथा ,फल कीपड़वार के लिए 25 से 27 डिग्री तापमान का होना आवश्यक है ,इसके अलावा अधिक यहद भी इसकी फसल को अधिक नुकसान पहुंचा सकती है ,इसलिए खेती के लिए सामान्य तापमान को आवश्यकता होती है।

कुसुम की खेती के लिए आवश्यक मिट्टी

आपको बता दे की कुसुम की खेत की भी भी प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है। वैसे तो इसके लिए बलुई मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है। इसकी खेती के लिए भूमि का PH मान 6 से 8 के बीच होना माना जाता है। जरूरी बात यह है की किसी भी फसल की बुआई से पहले खेत की मिट्टी के जांच करनी चाहिए। इसके आलावा रेतीली और पोषक तत्वों से भरपूर मिट्टी में भी इसकी अच्छी पैदावार को प्राप्त कर सकते है।

कुसुम फसल के लिए सिचाई की आवश्यकता

आपको बता दे की कुसुम की खेती करने के लिए सिचाई की आवश्यकता पड़ती है कुसुम की पौध रोपाई के तुरंत बाद इसकी सिचाई करनी चाहिए। इसकी पौध रोपाई से लेकर फसल को काटने तक इसकी सिचाई की जाती है। इसकी पहली सिचाई पौधा रोपाई पर की जाती है ,और दूसरी सिचाई 50 दिनों के बाद की जाती है ,इसके अलावा आवश्यकता होने पर भी इसकी सिचाई कर सकते है।

खरपतवार नियंत्रण

आपको बता दे की इसकी खेती के लिए भी खेत में खरपतवार को नियंत्रण करना आवश्यक है ,इसके लिए दो तरिके होते है – एक प्राकृतिक और दूसरा रासायनिक। आपको बता दे की प्राकृतिक तरीके से खेत में निराई – गुड़ाई करने से अच्छी पैदावार होती है ,और किसानो को अधिक मात्रा में मुनाफा भी होता है।

कुसुम की खेती की लिए खेत को तैयार करना

आपको बता दे की इसकी खेती के लिए खेत को अच्छे से तैयार करना चाहिए ,उसके लिए खेत की अच्छे से गहरी जुताई करे ,और खेती को कुछ समय के लिए खुला छोड़ दे और उसके बाद खेत में गोबर की खाद का प्रयोग करना चाहिए उसके बाद खेत की मिट्टी में खाद को जुताई की सहायता से अच्छे से मिलाना चाहिए। उसके बाद खेत में पानी से पलेव करना चाहिए उसके बाद जब खेत की मिट्टी अच्छे से सूख जाये तब उसमे फिर से जुताई करे ,जिससे मिट्टी भुरभुरी हो जाये और अच्छी पैदावार हो सके।

कुसुम की उन्नत किस्मे

  • K 65 किस्म
  • कुसुम A 1 किस्म
  • अक्षागिरी 59-2 किस्म
  • ए 300 किस्म
  • मालवीय कुसुम 305 ,तारा किस्म
  • ISF – 5 किस्म
  • भीमा किस्म आदि किस्मे है

कुसुम की खेती में उर्वर की मात्रा

आपको बता दे की कुसुम की अच्छी पैदावार के लिए खेत में उर्वरको का प्रयोग किया जाता है , जिससे पैदावार भी अच्छी होती है ,और किसानो को अच्छा मुनाफा भी मिलता है, उसके लिए खेत में उर्वरक के लिए यह डाले ,जो इस प्रकार है –

  • फास्फोरस 20 KG
  • नाइट्रोजन 40 KG
  • पोटाश 20 KG

कुसुम की खेती में कुसुम की खेती में रोग और कीट रोकथाम

आपको बता दे की इस रोग में अल्टरनेरिया लीफ स्पॉट देखने को अधिक मिलता है ,इसके अलावा अन्य रोग क दिखाई देते है। इस रोग के रोकथाम के लिए खेत में बीजो को बोन से पहले बीजो को उपचारित कर लेना चाहिए। इसके अलावा इस रोग के होने पर लक्षण दिखाई दे तो उसके लिए डायथेन एम- 45 का घोल बनाकर खेत में स्प्रै करनी चाहिए। इसके साथ खेत में फसल चक्र को भी अपनाना चाहिए।

आपको बता दे की कुसुम की फसल में कीट कम दिखाई देते है लेकिन काली लहि कीट कभी -कभी दिखाई देता है तो उसके लिए आपको बीजो को उपचारित करना चाहिए।

कुसुम के पौधे की कटाई और पैदावार

आपको बता दे की कुसुम की फसल बीजो की बुआई के 130 से 150 दिनको के बाद पैदावार देती है। इसकी कटाई तब करे जब फसल पूरी तरह पककर तैयार हो जाये और तब उसके बाद पौधे की निचली पत्तियों के कटाई करनी चाहिए ,क्योकि इसकी पणीचे की पत्तियों में काटे पाए जाते है ,जो फसल की कटाई में हमे नुकसान न पहुंचा सके ,उसके बाद काटी गयी फसल को कुछ दिनों तक अच्छे से धूप में सूख ले ,उसके बाद उस्सको डंडे से पीटकर कुसुम को अलग करे।

आपको बता दे की कुसुम को पौधा पूरा काम आता है ,इसकी पत्तिया ,बीज ,तेल और छिलका सभी कुछ न कुछ काम में लिए जाता है ,इसका बाजारी भाव काफी अच्छा पाया जाता है। असिंचित क्षेत्रों की बात की जाये को इसकी 10 से 15 किवंटल की उपज होती है। और सिंचित क्षेत्रों की बात करे तो 14 से 20 किवंटल की पैदावार देती है .

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