जानिए ? धान की खेती में लगने वाली दो खतरनाक रोग और रोकथाम के उपाय

Written by Saloni Yadav

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Paddy diseases and prevention :

आपको बता दे की धन में वैसे तो कई प्रकार के रोग देखने को मिलते है ,लेकिन इसके अलावा भी दो रोग इसकी फसल में देखने को मिलते है। जो की फसल का काफी नुकसान करके किसनो को हानि पहुँचता है धन में दो प्रकार के खतरनाक रोग देखने को मिलते है ,जोकि फसल को अधिक मात्रा में नुकसान पहुंचते है। यह दो रोग है जिसको सही समय पर रोकथाम नहीं किया तो यह रोग पूरी तरह से फसल को नष्ट कर देता है।

झोंका रोग और झुलसा रोग ये रोग ऐसे है जो पूरी फसल में फैलकर फसल को नष्ट करते है ,जिससे किसानो को काफी नुकसान उठाना पड़ता है। इस रोगो से पीधो की पत्तियों पर धब्बे दिखाई देते है ,जो कुछ समय बाद बड़े हो जाते है ,जिससे पत्तिया सूख जाती है और नष्ट हो जाती है। धब्बे को रंग काल तथा भूरा होता है और कुछ दिनों के बाद यह धब्बे पौधे के पूरे भागो पर फैल जाता है ,और जिससे फसल जली हुए दिखाई देती है। एशियाई देशो में धान की खेती 90 % की जाती है। और धान को आय का प्रमुख साधन माना जाता है।

दुनिया भर में आधे लोग ऐसे है जिसका भोजन ही चावल होता है ,यानि की आधी से ज्यादा जनसख्या भोजन के रूप में चावल को खाती है। धान की खेती से फसल की अच्छी देखभाल करने से किसानो को अच्छी आय प्राप्त होती है। लेकिन जब पोधो में खतरनाक रोग देखने को मिल जाते है , तो किसानो की पूरी मेहनत ख़राब हो जाती है ,और इसकी लिए किसानो को हानि उठानी पड़ती है। भारत में चावल का उत्पादन दूसरे नंबर पर किया जाता है। और प्रथम स्थान धान उत्पादन में चीन का है। धान में झोंका रोग और झुलसा रोग लग जाते है लेकिन समय से पहले उपचार करना आवश्यक होता है। अगर आप भी झोंका रोग और झुलसा रोग के होने पर परेशान है तो यह पोस्ट आपके लिए काफी लाभदायक हो सकती है ,इसलिए आज हम आपको झोंका रोग और झुलसा रोग के सम्पूर्ण जानकारी देंगे।

धान की फसल में लगने वाले दो खतरनाक रोग

झोंका रोग

आपको बता दे की यह रोग काफी खतरनाक होता है ,जो फसल को पूरी तरह से नष्ट कर देता है। यह रोग फसल में पाइरीकुलेरिया ओराइजी रोग के कारण फैलता है।,यह रोग असिंचित धान की किस्मो में अधिक मिलता है। यह रोग पौधे की पत्तियों ,तनो और बालियों पर अधिक आक्रमण करता है। इस रोग के हो जाने से पौधे की पत्तियों पर आँख जैसे और राख रंग के धब्बे हो जाते है। तथा तना और पौधे पर आयी बालिया काली पड़ जाती है। कुछ दिनों के बाद ही पौधे का तना पूरी तरह से खराब हो जाता है। और सूखकर गिर जाता है। इस रोग का प्रकोप ज्यादातर जुलाई और सितम्बर की महीने में देखने को मिलता है।

झोका रोग के रोकथाम के उपाय

  • जब यह रोग पोधो पर दिखाई दे तब पोधो पर जब बालिया निकले तब कार्बेन्डाजिम 50% घुलनशील धूल की 15–20 ग्राम मात्र को 15 ली. पानी में घोलकर स्प्रै करनी चाहिए ,क्योकि यह रोग बालियों पर अधिक आक्रमण करता है।
  • यह रोग पौधे पर अधिक हो जाता है तो उसके नियंत्रण के लिए पौधे पर फूल आते समय फूलो पर ट्राईसाइक्लेजोल से उपचारित करना चाहिए।
  • ऐसी किस्मो का चयन करे जो रोग प्रतिरोग हो जैसे – मझरा – 7, वी.एल.धान – 61 और VL धान 206 आदि।
  • बीजो का चयन करे तो केन्द्रो से रोगरहित किस्मो का चयन करना चाहिए।

झुलसा रोग

यह रोग जेंथोमोनास ओराइजी नामक फफूंद से फैलता है यह रोक पौधे के विकास ,पौधे पर फूल आते समय और पौधे से फसल की तुड़ाई के दौरान यह रोग लग सकता है। वेस तो यह रोग पौधे पर पौध रोपी के 25 दिनों के बाद ही दिखाई देने लग जाते है। और सबसे ज्यादा पौधे की पत्तियों को प्रभावित करते है ,इस रोग के हो जाने से पौधे कमजोर हो जाते है ,और दानो को विकास भी अच्छे से नहीं हो पता है ,जिससे फसल में पैदावार भी कम मात्रा में होती है इस रोग के हो जाने से पौधे की जड़े ,तने और पत्तिया पूरी तरह खराब होकर पुआल की तरह दिखाई दें लग जाती है ,इस रोग के पौधे पर लगने से पौधे में अनेक प्रकार के लक्षण दिखाई देते है। और पौधे में अनेक बदलाव की स्थिति दिखाई देती है यह रोग पौधे के एक भाग पर फैलकर धीरे -धीरे अन्य भागो पर फैल जाता है और पौधे को समाप्त कर देता है। यह रोग फसल में 50 % से भी अधिक नुकसान कर सकता है ,यह रोग बहुत खतरनाक होता है।

झुलसा रोग के रोकथाम के उपाय

  • सबसे पहले अच्छी किस्म का चयन करे और नर्सरी में स्वस्थ और शुद्ध बीजो को ही खरीदे।
  • नर्सरी में बीज की रोपाई से पहले बीजो को स्ट्रेप्टोसाइक्लिन और कापर आक्सी क्लोराइडके घोल में डुबोकर 12 घंटो तक रखे ,उसके बाद बीजो को लगाए।
  • जिस खेत या फसल में यह रोग हो जाने से उस खेत का पानी दूसरे खेत में न जाने दे ,क्योकि यह रोग दूसरी फसल पर भी फैल सकता है ,जिससे दूसरी फसल भी इस रोग का शिकार बन सकती है।
  • इस रोग से प्रभावित फसल में सिचाई या पानी की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए।
  • अगर यह रोग अधिक हो जाये तो इसके रोकथाम के लिए फसल पर बायोवेल का जैविक कवकनाशी बायो ट्रूपर का घोल बनाकर स्प्रै करनी चाहिए।

इस प्रकार से इन दोनों खतरनाक रोगो से छूटकर पा सकते है। और किसानो को फसल में लगने वाले रोगो से छूटकर मिल जाता है और फसल की अच्छी देखभाल से किसानो को अधिक पैदावार से लाभ होता है।

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